केवल 24 घंटे ही क्यों खुला रहता, विश्व का एकमात्र श्री नागचंद्रेश्वर मंदिर…

विश्व का एकमात्र श्री नागचंद्रेश्वर मंदिर केवल 24 घंटे ही क्यों खुला रहता है, जानेगें मंदिर के बारे में रोचक तथ्य जिनसे आप अब तक थे अनजान:-

उज्जैन: उज्जैन में स्थित श्री नागचंद्रेश्वर मंदिर, वर्ष में एक बार नागपंचमी के दिन मंदिर खुलने की पौराणिक मान्यता हैं। यह मंदिर काफी प्राचीन है। माना जाता है कि परमार राजा भोज ने 1050 ईस्वी के लगभग इस मंदिर का निर्माण करवाया था। इसके बाद सिं‍धिया घराने के महाराज राणोजी सिंधिया ने 1732 में महाकाल मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। उस समय इस मंदिर का भी जीर्णोद्धार हुआ था। हर साल एक दिन मे लाखों लोग दर्शन लाभ लेते रहे हैं ।

हिंदू धर्म में सदियों से नागों की पूजा करने की परंपरा रही है। भारत में नागों के अनेक मंदिर हैं, इन्हीं में से एक मंदिर है उज्जैन स्थित नागचंद्रेश्वर का, जो भगवान महाकाल की नगरी उज्जैन में स्थि‍त है। इस मंदिर की खास बात यह है कि यह साल में सिर्फ एक दिन नागपंचमी पर ही दर्शनों के लिए खोला जाता है। ऐसी मान्यता है कि नागराज तक्षक स्वयं मंदिर में रहते हैं।

ऐसी मान्यता है कि स्वयं मंदिर में रहते हैं- नागराज तक्षक:-

ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर में स्वयं नागराज तक्षक निवास करते हैं। कहा जाता हैं जब सर्पराज तक्षक ने शिवशंकर को मनाने के लिए घोर तपस्या की थी। तपस्या से भोलेनाथ प्रसन्न हुए और उन्होंने सर्पों के राजा तक्षक नाग को अमर होने का वरदान दिया। मान्यता है कि उसके बाद से तक्षक राजा ने प्रभु के सा‍‍‍न्निध्य में ही वास करना शुरू कर दिया। लेकिन महाकाल वन में वास करने से पूर्व उनकी यही मंशा थी कि उनके एकांत में विघ्न ना हो अत: वर्षों से यही प्रथा है कि मात्र नागपंचमी के दिन ही वे दर्शन को उपलब्ध होते हैं।

शेष समय उनके सम्मान में परंपरा के अनुसार मंदिर बंद रहता है। इस मंदिर में दर्शन करने के बाद व्यक्ति किसी भी तरह के सर्पदोष से मुक्त हो जाता है, इसलिए नागपंचमी के दिन खुलने वाले इस मंदिर के बाहर भक्तों की लंबी कतार लगी रहती है।

नेपाल से लाई गई प्रतिमा उज्जैन के अलावा दुनिया में और कहीं भी नहीं:-

श्री नागचंद्रेश्वर मंदिर में 11वीं शताब्दी की एक अद्भुत प्रतिमा है, इसमें फन फैलाए नाग के आसन पर शिव-पार्वती बैठे हैं। कहते हैं यह प्रतिमा नेपाल से यहां लाई गई थी। उज्जैन के अलावा दुनिया में कहीं भी ऐसी प्रतिमा नहीं है। पूरी दुनिया में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें विष्णु भगवान की जगह भगवान भोलेनाथ सर्प शय्या पर विराजमान हैं। मंदिर में स्थापित प्राचीन मूर्ति में शिवजी, गणेशजी और मां पार्वती के साथ दशमुखी सर्प शय्या पर विराजित हैं। शिवशंभू के गले और भुजाओं में भुजंग लिपटे हुए हैं।

नागचंद्रेश्वर मंदिर में की जाती है, त्रिकाल पूजा:-

श्री महाकालेश्वर मंदिर की तीसरी मंजिल पर श्री नागचंद्रेश्वर का एक दुर्लभ स्वरूप स्थापित है, जिसे नागराज तक्षक का निवास स्थान कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर में नागचंद्रेश्वर के दर्शन करने के बाद व्यक्ति किसी भी प्रकार के सर्प दोष से मुक्त हो जाता है। नागचंद्रेश्वर मंदिर के कपाट खुलते ही त्रिकाल पूजा का प्रावधान है। त्रिकाल का अर्थ है तीन अलग-अलग समय पर की जाने वाली पूजा। जिसमें पहली पूजा महानिर्वाणी अखाड़े द्वारा मध्य रात्रि 12 बजे कपाट खुलने के बाद की जाती है।नाग पंचमी के दिन दोपहर 12 बजे प्रशासन की ओर से अधिकारियों द्वारा दूसरी पूजा की जाती है। तीसरी पूजा शाम 7:30 बजे भगवान महाकाल की संध्या आरती के बाद मंदिर समिति की ओर से महाकाल मंदिर के पुजारियों द्वारा की जाती है। जिसके बाद मध्य रात्रि में आरती के बाद मंदिर के कपाट पुनः एक वर्ष के लिए बंद कर दिए जाते हैं।

उज्जैन से हमारे संवाददाता गोपाल आँजना की रिपोर्ट

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