ऋणानुबंधन: आत्मा और रिश्तों का सफर…

आत्मा का बंधन: ऋणानुबंधन का महत्वः-

नोएडाः  हिंदू धर्म में माना गया है कि आत्मा कभी नष्ट नहीं होती—वह शाश्वत और अनंत है। यह आत्मा बार-बार जन्म लेकर नए शरीर धारण करती है। हर जन्म में जब आत्माएँ मिलती हैं, उनके बीच कोई पुराना संबंध या बंधन छुपा होता है। यही बंधन हमारे जीवन के रिश्तों का आधार बनता है।जब हमें किसी से अनजाने में गहरा अपनापन महसूस होता है, या बिना किसी वजह किसी से दूरी बनाना पड़ता है, तो समझिए यह पिछले जन्म का कोई अधूरा बंधन है। जब तक आत्मा अपने पुराने ऋण नहीं चुका देती, वह अलग-अलग जन्म लेकर उन्हीं आत्माओं से मिलती रहती है।

ऋणानुबंधन के मुख्य स्वरूप – 1. पितृ ऋण: माता-पिता और पूर्वजों के प्रति हमारी जिम्मेदारी। 2. ऋषि ऋण: गुरु, शिक्षक और ज्ञानदाताओं से मिला फर्ज़। 3. देव ऋण: प्रकृति, देवता और समाज को दिया जाने वाला सम्मान। 4. संबंधों का ऋण: परिवार, मित्र, जीवनसाथी, संतान और यहाँ तक कि विरोधियों से जुड़ा अटूट संबंध।

शास्त्रीय आधार – बृहदारण्यक उपनिषद: “यथाकर्म यथाश्रुतं भवति।” (मनुष्य अपने कर्मों और संस्कारों के अनुसार जन्म और रिश्ते पाता है।) भगवद्गीता (अध्याय 2, श्लोक 22): जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र छोड़कर नए धारण करता है, वैसे ही आत्मा शरीर बदलती है। गरुड़ पुराण: आत्मा तब तक जन्म लेती रहती है जब तक उसका हर प्रकार का ऋण समाप्त नहीं हो जाता। महाभारत और पुराण: शिखंडी, भीष्म, द्रोणाचार्य, सती-पार्वती की कथाएँ यह दर्शाती हैं कि अधूरे रिश्ते अगले जन्म में पूर्ण होते हैं।

ऋणानुबंधन की पहचान – पहली मुलाक़ात में ही गहरा अपनापन या अकारण घृणा महसूस होना।बिना वजह किसी की ओर खिंचाव या दूरी। बार-बार सपनों में दिखाई देना। ऐसा लगना जैसे कोई पुराना हिसाब बाकी हो।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण – Déjà Vu: पहली बार किसी से मिलकर उसे पहले से जानने का अनुभव। Past Life Regression Therapy: कुछ लोग पिछले जन्म की घटनाएँ याद कर सकते हैं। मनोविज्ञान: इसे अवचेतन मन (subconscious mind) का खेल मानता है, पर हिंदुत्व इसे आत्मा की यात्रा से जोड़ता है।

क्यों जरूरी है ऋणानुबंधन को समझना?

हर रिश्ता—माँ-बाप, दोस्त, जीवनसाथी, बच्चे या कोई भी—सिर्फ इस जन्म का नहीं, यह हमारे कर्मों और पिछले जन्म के संयोगों से बनता है। जब हम अपने रिश्तों और कर्तव्यों को पूरी श्रद्धा और सच्चाई से निभाते हैं, तब आत्मा को सुकून और मुक्ति मिलती है। धर्म और मर्यादा के साथ निभाया गया रिश्ता न केवल व्यक्तिगत जीवन को संतुलित बनाता है, बल्कि आत्मा की यात्रा को भी पूर्ण करता है।

निष्कर्ष: ऋणानुबंधन जीवन का शाश्वत सत्य है। यह बताता है कि हमारे रिश्ते केवल इस जन्म के नहीं, बल्कि कई जन्मों के कर्म और बंधनों से जुड़े हैं। इसीलिए हर संबंध को कर्तव्य, श्रद्धा और संतुलन के साथ निभाना आत्मा और जीवन दोनों के लिए आवश्यक है।

लेखक
चन्द्रपाल प्रजापति, नोएडा
chanderpal252@gmail.com

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